१. प्रास्ताविकम् (परिचय)

भाषाशिक्षणं मानवजीवनस्य अत्यन्तं महत्त्वपूर्णं प्रक्रिया अस्ति। भाषायाः माध्यमेनैव मनुष्यः स्वविचारान् भावांश्च अभिव्यक्तुं शक्नोति। भाषाशिक्षणस्य क्षेत्रे द्वे प्रमुखे प्रक्रिये स्तः — भाषायाः अर्जनम् (Language Acquisition) तथा भाषाधिगमः (Language Learning)। एतयोः प्रक्रिययोः स्वरूपं, विशेषताः, मनोवैज्ञानिकाधाराश्च अध्यायस्यास्य मुख्यविषयाः सन्ति।

(भाषा-शिक्षण मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। भाषा के माध्यम से ही मनुष्य अपने विचार और भावनाओं को अभिव्यक्त कर सकता है। भाषा-शिक्षण के क्षेत्र में दो प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं — भाषा का अर्जन (Language Acquisition) तथा भाषा अधिगम (Language Learning)। इन दोनों प्रक्रियाओं का स्वरूप, विशेषताएँ और मनोवैज्ञानिक आधार इस अध्याय के मुख्य विषय हैं।)


२. भाषायाः अर्जनम् (भाषा का अर्जन)

२.१ स्वरूपम् (स्वरूप)

भाषायाः अर्जनं सहजा, स्वाभाविकी, अवचेतना च प्रक्रिया अस्ति। बालकः जन्मनः आरभ्य स्वपरिवारस्य, समाजस्य, परिवेशस्य च संसर्गेण स्वमातृभाषां विना कस्यापि औपचारिकप्रयासस्य अर्जयति। अस्यां प्रक्रियायां व्याकरणस्य नियमाः प्रथमतः न पाठ्यन्ते, न च शब्दकोशस्य कण्ठस्थीकरणम् आवश्यकं भवति।

(भाषा का अर्जन सहज, स्वाभाविक और अवचेतन प्रक्रिया है। बालक जन्म से ही अपने परिवार, समाज और परिवेश के संसर्ग से अपनी मातृभाषा को बिना किसी औपचारिक प्रयास के अर्जित करता है। इस प्रक्रिया में व्याकरण के नियम पहले नहीं पढ़ाए जाते, न ही शब्दकोश का कंठस्थीकरण आवश्यक होता है।)

२.२ मुख्यविशेषताः (मुख्य विशेषताएँ)

१. स्वाभाविकी प्रक्रिया (स्वाभाविक प्रक्रिया)
२. अवचेतनरूपेण भवति (अवचेतन रूप से होती है)
३. परिवारः समाजश्च प्रमुखं क्षेत्रम् (परिवार और समाज प्रमुख क्षेत्र हैं)
४. व्याकरणनियमानां प्राथम्यं नास्ति (व्याकरण नियमों की प्राथमिकता नहीं)
५. औपचारिकव्याकरणपुस्तकस्य आवश्यकता नास्ति (औपचारिक व्याकरण पुस्तक की आवश्यकता नहीं)
६. मातृभाषायै अपरिहार्यम् (मातृभाषा के लिए अपरिहार्य)
७. प्राकृतिकभाषाग्रहणस्य पर्यायः (प्राकृतिक भाषा ग्रहण का पर्याय)

२.३ अर्जनस्य क्षेत्राणि (अर्जन के क्षेत्र)

अर्जनस्य प्रमुखं क्षेत्रं परिवारः समाजश्च अस्ति। बालकः जन्मनांतरं परिवारैः समाजैः च सह संभाषते, अतः अर्जनं तत्रैव भवति। परिवारः बालस्य प्रथमः पाठशाला अस्ति यतः सः प्रथमं भाषां तत्रैव अर्जयति।

(अर्जन का प्रमुख क्षेत्र परिवार और समाज है। बालक जन्म के बाद परिवार और समाज के साथ संवाद करता है, अतः अर्जन वहीं होता है। परिवार बालक की पहली पाठशाला है क्योंकि वह पहली भाषा वहीं अर्जित करता है।)

२.४ अर्जनाय आवश्यकतत्वानि (अर्जन के लिए आवश्यक तत्व)

— स्वाभाविकप्रवेशः (स्वाभाविक परिवेश)
— श्रवणम् (सुनना)
— मातृभाषायाः संसर्गः (मातृभाषा का संसर्ग)
— सामाजिकपरिवेशः (सामाजिक परिवेश)
— मानवसंसर्गः (मानव संसर्ग)

अर्जनाय औपचारिकव्याकरणपुस्तकस्य आवश्यकता नास्ति। बालकाः व्याकरणं न ज्ञात्वापि मातृभाषां गृह्णन्ति।

(अर्जन के लिए औपचारिक व्याकरण पुस्तक की आवश्यकता नहीं होती। बालक व्याकरण न जानकर भी मातृभाषा को ग्रहण करते हैं।)


३. भाषाधिगमः (भाषा अधिगम)

३.१ स्वरूपम् (स्वरूप)

भाषाधिगमः सचेतनप्रक्रिया अस्ति यस्यां व्याकरणस्य नियमाः औपचारिकरूपेण शिक्ष्यन्ते। अस्यां प्रक्रियायां पाठ्यपुस्तकानि, व्याकरणनियमाः, शिक्षकः, औपचारिककक्षा च मुख्यसाधनानि भवन्ति।

(भाषा अधिगम सचेतन प्रक्रिया है जिसमें व्याकरण के नियम औपचारिक रूप से सिखाए जाते हैं। इस प्रक्रिया में पाठ्यपुस्तकें, व्याकरण नियम, शिक्षक और औपचारिक कक्षा मुख्य साधन होते हैं।)

३.२ मुख्यविशेषताः (मुख्य विशेषताएँ)

१. सचेतनप्रक्रिया (सचेतन प्रक्रिया)
२. प्रयासयुक्ता (प्रयास युक्त)
३. नियमानाम् अध्ययनम् (नियमों का अध्ययन)
४. औपचारिकशिक्षणम् (औपचारिक शिक्षण)
५. विद्यालयः शिक्षकश्च मुख्यसाधनम् (विद्यालय और शिक्षक मुख्य साधन)
६. द्वितीयभाषायै अनिवार्यम् (द्वितीय भाषा के लिए अनिवार्य)
७. शुद्धता नियमपालनं च प्रधानम् (शुद्धता और नियम पालन प्रधान)

३.३ अधिगमाय आवश्यकतत्वानि (अधिगम के लिए आवश्यक तत्व)

— सचेतनप्रयासः (सचेतन प्रयास)
— औपचारिकशिक्षणम् (औपचारिक शिक्षण)
— शिक्षकः (शिक्षक)
— पाठ्यपुस्तकं व्याकरणं च (पाठ्यपुस्तक और व्याकरण)
— औपचारिककक्षा (औपचारिक कक्षा)
— अनुशासनं नियमबद्धाभ्यासश्च (अनुशासन और नियमबद्ध अभ्यास)

३.४ अधिगमस्य उद्देश्याः (अधिगम के उद्देश्य)

— भाषायां प्रवीणता सम्प्राप्तिः (भाषा में प्रवीणता प्राप्ति)
— नियमाधिगमः (नियमों का अधिगम)
— शुद्धता (शुद्धता)
— पठनलेखनकौशलयोः विकासः (पठन और लेखन कौशल का विकास)
— बौद्धिकविकासः शैक्षिकोन्नतिश्च (बौद्धिक विकास और शैक्षिक उन्नति)


४. अर्जनं अधिगमश्च — तुलनात्मकसारणी (अर्जन और अधिगम — तुलनात्मक सारणी)

आधारः (आधार) अर्जनम् (अर्जन) अधिगमः (अधिगम)
स्वरूपम् (स्वरूप) स्वाभाविकी प्रक्रिया सचेतनप्रक्रिया
चेतना (चेतना) अवचेतनम् / अचेतनम् सचेतनम्
प्रयासः (प्रयास) प्रयासरहितम् प्रयासयुक्तम्
क्षेत्रम् (क्षेत्र) परिवारः समाजश्च विद्यालयः कक्षा च
नियमाः (नियम) नियमाः प्रथमं न पाठ्यन्ते नियमाः प्रथमं पाठ्यन्ते
साधनम् (साधन) मानवसंसर्गः श्रवणञ्च पाठ्यपुस्तकं व्याकरणं शिक्षकश्च
उदाहरणम् (उदाहरण) मातृभाषायाः ग्रहणम् द्वितीयभाषायाः शिक्षणम्
परिणामः (परिणाम) स्वाभाविकी भाषाप्रवीणता मानकीकृतं व्याकरणिकं ज्ञानम्

५. मनोवैज्ञानिकसिद्धान्ताः (मनोवैज्ञानिक सिद्धांत)

५.१ नोम चोम्स्की — भाषायाः अर्जनक्षमता सिद्धान्तः (LAD)

नोम चोम्स्की महोदयः भाषायाः अर्जनक्षमता सिद्धान्तं (Language Acquisition Device — LAD) प्रतिपादितवान्। अस्य मतानुसारं बालकेषु भाषायाः जन्मजातक्षमता भवति यस्याः साहाय्येन अर्जनं भवति। LAD इति Language Acquisition Device इत्यस्य पूर्णरूपम् अस्ति।

(नोम चोम्स्की महोदय ने भाषा की अर्जन क्षमता सिद्धांत (Language Acquisition Device — LAD) प्रतिपादित किया। उनके मत के अनुसार बालकों में भाषा की जन्मजात क्षमता होती है जिसकी सहायता से अर्जन होता है। LAD का पूर्ण रूप Language Acquisition Device है।)

मुख्यबिन्दवः (मुख्य बिंदु):

— भाषा की जन्मजात क्षमता (Innate Language Capacity)
— LAD — जन्मजात भाषा ग्रहण यंत्र
— बालकेषु जन्मजातजन्मतः क्षमता विद्यते
— चोम्स्की भाषाविज्ञानस्य जनकः

५.२ लेव वायगोत्स्की — सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्तः

लेव वायगोत्स्की महोदयस्य मते भाषा समाजस्य संस्कृत्याः च अंतःक्रियायाः परिणामः अस्ति। अनेन सामाजिकपरिवेशस्य महत्त्वं भाषाविकासे प्रतिपादितम्।

(लेव वायगोत्स्की महोदय के मत में भाषा समाज और संस्कृति की अंतःक्रिया का परिणाम है। उन्होंने सामाजिक परिवेश के महत्त्व को भाषा विकास में प्रतिपादित किया।)

५.३ बी. एफ. स्किनर — व्यवहारवादः (Behaviorism)

स्किनर महोदयस्य अनुसारं बालकाः अनुकरणेन प्रबलनेन च (Imitation and Reinforcement) भाषां शिखन्ति। अयं व्यवहारवादस्य (Behaviorism) सिद्धान्तः अस्ति।

(स्किनर महोदय के अनुसार बालक अनुकरण और प्रबलन द्वारा भाषा सीखते हैं। यह व्यवहारवाद (Behaviorism) का सिद्धांत है।)

५.४ सिद्धान्तानां तुलना (सिद्धांतों की तुलना)

विद्वान् (विद्वान) सिद्धान्तः (सिद्धांत) मुख्यविचारः (मुख्य विचार)
नोम चोम्स्की अर्जनक्षमता सिद्धान्तः (LAD) जन्मजात भाषा क्षमता
लेव वायगोत्स्की सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्तः समाज और संस्कृति की भूमिका
बी. एफ. स्किनर व्यवहारवादः (Behaviorism) अनुकरण और प्रबलन
जीन पियाजे संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्तः संज्ञानात्मक विकास

६. ग्रहणशीलता (Receptivity)

६.१ स्वरूपम् (स्वरूप)

ग्रहणशीलता ग्राह्यकौशलाभ्यां (Receptive Skills) सम्बद्धा अस्ति — श्रवणम् (Listening) तथा पठनम् (Reading)। भाषाशिक्षणावसरे छात्रस्य श्रवणपठणयोः ग्रहणशीलता प्रबुद्धा भवति।

(ग्रहणशीलता ग्राह्य कौशलों (Receptive Skills) से संबंधित है — श्रवण (सुनना) तथा पठन (पढ़ना)। भाषा-शिक्षण के अवसर पर छात्र के सुनने और पढ़ने की ग्रहणशीलता प्रबुद्ध होती है।)

६.२ ग्रहणशीलतायाः विकासे भूमिका (ग्रहणशीलता के विकास में भूमिका)

श्रवणकौशलस्य पठनकौशलस्य च भूमिका महत्त्वपूर्णा अस्ति। यदा वयं शृणुमः पश्यामः वा, तदैव भाषायाः ग्रहणशीलता वर्धते।

(श्रवण कौशल और पठन कौशल की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। जब हम सुनते हैं या देखते हैं, तभी भाषा की ग्रहणशीलता बढ़ती है।)

६.३ भाषाकौशलानां वर्गीकरणम् (भाषा कौशलों का वर्गीकरण)

ग्राह्यकौशलम् (ग्राह्य कौशल) उत्पादककौशलम् (उत्पादक कौशल)
श्रवणम् (सुनना) भाषणम् (बोलना)
पठनम् (पढ़ना) लेखनम् (लिखना)

७. भाषाविकासस्य सोपानानि (भाषा विकास के सोपान)

७.१ प्रथमं सोपानम् (पहला सोपान)

क्रंदनं (रदनम्) बद्धध्वनिश्च बालकस्य भाषाविकासे प्रथमं सोपानम् अस्ति। शैशवकाले बालकः क्रन्दनेन ध्वनीनां च माध्यमेन संवादं करोति।

(रोना और बद्ध ध्वनि बालक के भाषा विकास में पहला सोपान है। शैशव काल में बालक रोने से और ध्वनियों के माध्यम से संवाद करता है।)

७.२ क्रमः (क्रम)

१. क्रंदनम् (रोना)
२. बद्धध्वनिः (बड़बड़ाना)
३. शब्दोच्चारणम् (शब्द बोलना)
४. वाक्यरचना (वाक्य बनाना)
५. भाषाप्रवीणता (भाषा में निपुणता)


८. भाषाशिक्षणस्य व्यावहारिकपक्षाः (भाषा-शिक्षण के व्यावहारिक पक्ष)

८.१ शिक्षकस्य भूमिका (शिक्षक की भूमिका)

शिक्षकः कक्षायां छात्राणां कृते भाषाधिगमस्य मार्गदर्शकः भवति। अधिगमप्रक्रियायां शिक्षकः मार्गदर्शकः भवति पाठ्यक्रमश्च आधारः भवति।

(शिक्षक कक्षा में छात्रों के लिए भाषा अधिगम का मार्गदर्शक होता है। अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक मार्गदर्शक होता है और पाठ्यक्रम आधार होता है।)

८.२ शिक्षणसाधनानि (शिक्षण साधन)

— पाठ्यपुस्तकं श्यामपट्टश्च (पाठ्यपुस्तक और श्यामपट्ट)
— शब्दकोशः व्याकरणकोशश्च (शब्दकोश और व्याकरण कोश)
— दृश्य-श्रव्योपकरणानि (दृश्य-श्रव्य उपकरण)
— शिक्षणसहायकोपकरणानि (शिक्षण सहायक उपकरण)

शिक्षणोपकरणानां प्रयोगेण जटिलविषयाः अपि सरलाः भवन्ति। दृश्य-श्रव्योपकरणैः अधिगमः रुचिपूर्णः सुगमश्च भवति।

(शिक्षण उपकरणों के प्रयोग से जटिल विषय भी सरल होते हैं। दृश्य-श्रव्य उपकरणों से अधिगम रुचिपूर्ण और सुगम होता है।)

८.३ अधिगमत्रिकोणः (अधिगम त्रिकोण)

शिक्षकः छात्रः पाठ्यपुस्तकं च — अधिगमत्रिकोणेषु प्रमुखाः घटकाः सन्ति।

(शिक्षक, छात्र और पाठ्यपुस्तक — अधिगम त्रिकोण में प्रमुख घटक हैं।)

८.४ मूल्याङ्कनम् (मूल्यांकन)

अधिगमान्ते छात्रस्य भाषागतक्षमतायाः परीक्षणं मूल्याङ्कनञ्च क्रियते।

(अधिगम के अंत में छात्र की भाषागत क्षमता का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाता है।)


९. द्वितीयभाषाशिक्षणम् (द्वितीय भाषा शिक्षण)

९.१ आवश्यकता (आवश्यकता)

द्वितीयभाषायाः (Second Language) शिक्षणाय भाषायाः अधिगमस्य आवश्यकता भवति। द्वितीयभाषा वा अन्यभाषा अधिगममाध्यमेनैव शिक्षणीया भवति।

(द्वितीय भाषा (Second Language) के शिक्षण के लिए भाषा के अधिगम की आवश्यकता होती है। द्वितीय भाषा या अन्य भाषा अधिगम माध्यम से ही सिखाई जानी होती है।)

९.२ अर्जनं अधिगमं च (अर्जन और अधिगम)

पक्षः (पक्ष) अर्जनम् (अर्जन) अधिगमः (अधिगम)
मातृभाषा (मातृभाषा) ✓ —
द्वितीयभाषा (द्वितीय भाषा) — ✓
विदेशीयभाषा (विदेशी भाषा) — ✓

१०. महत्त्वपूर्णशब्दावली (महत्त्वपूर्ण शब्दावली)

संस्कृतम् हिन्दी English
अर्जनम् अर्जन Acquisition
अधिगमः अधिगम Learning
ग्रहणशीलता ग्रहणशीलता Receptivity
श्रवणकौशलम् श्रवण कौशल Listening Skill
पठनकौशलम् पठन कौशल Reading Skill
लेखनकौशलम् लेखन कौशल Writing Skill
भाषणकौशलम् भाषण कौशल Speaking Skill
जन्मजातक्षमता जन्मजात क्षमता Innate Capacity
प्रबलनम् प्रबलन Reinforcement
अनुकरणम् अनुकरण Imitation
सचेतनप्रक्रिया सचेतन प्रक्रिया Conscious Process
अवचेतनप्रक्रिया अवचेतन प्रक्रिया Subconscious Process

११. स्मरणार्थं सूत्ररूपेण टिप्पण्यः (स्मरण हेतु सूत्र रूप में टिप्पणियाँ)

अर्जनम् (अर्जन) — याद रखें:

— स्व — स्वाभाविक
— अ — अवचेतन
— प — परिवार और समाज
— न — नियम बाद में
— आ — आवश्यकता नहीं व्याकरण पुस्तक की

अधिगमः (अधिगम) — याद रखें:

— स — सचेतन
— प्र — प्रयास युक्त
— नि — नियम पहले
— वि — विद्यालय और शिक्षक
— शु — शुद्धता प्रधान

विद्वान और सिद्धांत:

— चोम्स्की → LAD (Language Acquisition Device) → जन्मजात क्षमता
— वायगोत्स्की → सामाजिक-सांस्कृतिक → समाज और संस्कृति
— स्किनर → व्यवहारवाद → अनुकरण और प्रबलन
— पियाजे → संज्ञानात्मक विकास

ग्रहणशीलता (Receptivity):

— श्र — श्रवण (सुनना)
— प — पठन (पढ़ना)
= ग्राह्य कौशल (Receptive Skills)

भाषाविकास का प्रथम सोपान:

— क्रंदनम् (रोना) + बद्धध्वनिः (बड़बड़ाना)

द्वितीय भाषा:

— अधिगम द्वारा सिखाई जाती है (अर्जन द्वारा नहीं)

अर्जन के लिए आवश्यक:

— स्वाभाविक प्रवेश + श्रवण + मानव संसर्ग

अधिगम के लिए आवश्यक:

— सचेतन प्रयास + शिक्षक + पाठ्यपुस्तक + व्याकरण


१२. निष्कर्षः (निष्कर्ष)

भाषाशिक्षणस्य क्षेत्रे अर्जनं तथा अधिगमः इति द्वे भिन्ने प्रक्रिये स्तः। अर्जनं स्वाभाविकी, अवचेतनी, प्रयासरहिता च प्रक्रिया अस्ति या मातृभाषायै पर्याप्ता भवति। अधिगमः तु सचेतनः, प्रयासयुक्तः, नियमबद्धश्च प्रक्रिया अस्ति या द्वितीयभाषायै विदेशीयभाषायै च अनिवार्यः भवति। शिक्षकैः छात्रैश्च एतयोः प्रक्रिययोः स्वरूपं, विशेषताः, मनोवैज्ञानिकाधारांश्च सम्यक् अवगन्तव्याः सन्ति।

(भाषा-शिक्षण के क्षेत्र में अर्जन तथा अधिगम ये दो भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। अर्जन स्वाभाविक, अवचेतन और प्रयासरहित प्रक्रिया है जो मातृभाषा के लिए पर्याप्त होती है। अधिगम तो सचेतन, प्रयासयुक्त और नियमबद्ध प्रक्रिया है जो द्वितीय भाषा और विदेशी भाषा के लिए अनिवार्य होती है। शिक्षकों और छात्रों को इन दोनों प्रक्रियाओं का स्वरूप, विशेषताएँ और मनोवैज्ञानिक आधार भली-भांति समझने चाहिए।)


प्रतियोगिपरीक्षायै विशेषसूचनाः (प्रतियोगी परीक्षा के लिए विशेष सूचनाएँ)

१. अर्जन vs अधिगम — यह TET में सबसे अधिक पूछा जाने वाला विषय है
२. चोम्स्की का LAD — नाम, पूर्ण रूप, सिद्धांत — सभी याद करें
३. वायगोत्स्की — सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत
४. स्किनर — व्यवहारवाद, अनुकरण, प्रबलन
५. ग्रहणशीलता — श्रवण + पठन = ग्राह्य कौशल
६. अर्जन का क्षेत्र — परिवार + समाज
७. अधिगम का क्षेत्र — विद्यालय + शिक्षक
८. प्रथम सोपान — क्रंदन + बद्धध्वनि
९. द्वितीय भाषा — अधिगम द्वारा
१०. मातृभाषा — अर्जन द्वारा