माध्यमिक शिक्षक चयन परीक्षा - हिन्दी भाषा अपठित बोध एवं अभ्यास सेट
यह सामग्री माध्यमिक शिक्षक चयन परीक्षा के पाठ्यक्रम के अनुरूप भाषायी समझ, अवबोध, व्याकरण और मौखिक योग्यता को परखने के लिए तैयार की गई है। इसमें कुल 4 गद्यांश और 4 पद्यांश (कुल 8 अपठित) तथा उनके नियत वैकल्पिक प्रश्न दिए गए हैं।
अपठित गद्यांश 1 (साहित्यिक एवं सामाजिक समरसता पर आधारित)
भारतीय संस्कृति का मूल आधार सनातन सहिष्णुता और विविधता में एकता का दर्शन रहा है। आधुनिक युग में वैश्वीकरण और तकनीकी प्रगति के तीव्र वेग ने जहाँ एक ओर भौतिक सुविधाओं के द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक ताने-बाने और मानवीय संवेदनाओं के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। आज मनुष्य अपनी जड़ों से कटकर उपभोगवादी संस्कृति का अंधानुकरण कर रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप वैयक्तिक अलगाव, मानसिक तनाव और सांस्कृतिक प्रदूषण जैसी प्रवृत्तियाँ समाज में तेजी से घर कर रही हैं। ऐसे समय में साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और उसका विवेक है। जब समाज दिशाहीन होने लगता है, तब साहित्यकार अपनी सृजनात्मक चेतना से मूल्यों का पुनर्सृजन करता है। वह व्यक्ति को उसकी मानवीय गरिमा का स्मरण कराता है और उसे यह सिखाता है कि भौतिक प्रगति के साथ आंतरिक शुचिता और नैतिक उत्थान कितना अनिवार्य है। सामाजिक समरसता का वास्तविक अर्थ केवल भिन्न समुदायों का सह-अस्तित्व नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति आदर भाव और परस्पर सहानुभूति का जीवंत संचार है। यदि शिक्षा और साहित्य दोनों मिलकर नई पीढ़ी में इस विवेक का बीजारोपण करें, तो हम एक संतुलित और मानवीय समाज की स्थापना कर सकते हैं।
गद्यांश 1 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- भारतीय संस्कृति का मूल आधार निम्नलिखित में से किसे माना गया है?
प्रश्न 2- आधुनिक युग में मनुष्य के समक्ष कौन सी गंभीर प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं?
प्रश्न 3- गद्यांश के अनुसार साहित्य की वास्तविक भूमिका क्या है?
प्रश्न 4- सामाजिक समरसता का वास्तविक अर्थ गद्यांश में क्या बताया गया है?
प्रश्न 5- 'उपभोगवादी' शब्द में कौन सा प्रत्यय जुड़ा हुआ है?
प्रश्न 6- 'आंतरिक' शब्द का विलोम शब्द निम्नलिखित में से कौन सा होगा?
प्रश्न 7- गद्यांश में प्रयुक्त 'शुचिता' शब्द का उचित अर्थ क्या है?
प्रश्न 8- गद्यांश का केंद्रीय भाव या मूल संदेश क्या है?
अपठित पद्यांश 1 (मानवीय संघर्ष और कर्तव्य बोध पर आधारित)
झुक-झुक कर जो पाँव पूजते, वे इतिहास बनाते हैं क्या?
अग्निपरीक्षा के पथ पर जो, शीश चढ़ाकर जाते हैं क्या?
सुख के मदिरालय में डूबे, जो जीवन का मोल न जानें,
वे तूफानों की छाती पर, अपनी रेखा खींच पाते हैं क्या?
राह कठिन हो, पग-पग पर हों, बाधाओं के गहरे घेरे,
ध्येय पथिक जो रुक जाता है, मंजिल तक वो पहुँच पाते हैं क्या?
श्रम के स्वेद-कणों से जो अपने भाग्य का अंक लिखते,
वे नश्वर दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं क्या?
जलो मगर इस तरह कि जग में उजियारा फैल सके,
बुझने वाले दीपों से क्या तम के पंथ सँवर पाते हैं क्या?
कर्मवीर की यही परिभाषा, जीवन का संकेत यही है,
संघर्षों के बिना बताओ, कोई दीप प्रज्वलित पाते हैं क्या?
पद्यांश 1 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- पद्यांश के अनुसार वास्तविक इतिहास कौन लोग बनाते हैं?
प्रश्न 2- 'तूफानों की छाती पर रेखा खींचना' इस मुहावरे/काव्यक्ति का क्या आशय है?
प्रश्न 3- 'श्रम के स्वेद-कणों' से कवि का क्या तात्पर्य है?
प्रश्न 4- कवि ने किस प्रकार जलने का संदेश दिया है?
प्रश्न 5- पद्यांश में प्रयुक्त 'तम' शब्द का पर्यायवाची निम्नलिखित में से कौन सा है?
प्रश्न 6- पद्यांश की भाषा की मुख्य विशेषता क्या है?
प्रश्न 7- संपूर्ण पद्यांश का मूल संदेश क्या है?
अपठित गद्यांश 2 (पर्यावरण संरक्षण और तात्कालिक चिंता पर आधारित)
आज संपूर्ण विश्व एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ा है। औद्योगिक क्रांति के आरंभ से लेकर वर्तमान समय तक जिस अंधाधुंध विकास मॉडल को हमने अपनाया है, उसने प्रकृति और मनुष्य के बीच के नाजुक संतुलन को बुरी तरह विचलित कर दिया है। वनों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का प्रदूषित होना, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ अब केवल भविष्य की आशंकाएँ नहीं, बल्कि हमारी वर्तमान वास्तविकता बन चुकी हैं। भारतीय मनीषा ने वेदों के काल से ही 'माता भूमः पुत्रोऽथ पृथिव्याः' का उद्घोष कर प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया था। परंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति को भोग्या मान लिया, जबकि वह हमारी पालनहार है। विकास की इस अंधी दौड़ में जैव विविधता का तेजी से ह्रास हुआ है, जिससे कई दुर्लभ प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं। यदि समय रहते हमने अपनी विकास रणनीतियों में पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण (Ecological Approach) को शामिल नहीं किया, तो आगामी पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा और पीने योग्य पानी जैसी बुनियादी जरूरतें भी दुर्लभ हो जाएंगी। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच एक सार्थक संतुलन स्थापित किया जाए, जिसमें सतत विकास (Sustainable Development) का संकल्प केवल कागजी दस्तावेज न रहकर हमारी सामूहिक जीवनशैली का अभिन्न अंग बने।
गद्यांश 2 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- वर्तमान में संपूर्ण विश्व किस प्रकार के संकट का सामना कर रहा है?
प्रश्न 2- भारतीय मनीषा ने प्राचीन काल में पृथ्वी के संबंध में क्या संदेश दिया था?
प्रश्न 3- आधुनिक विकास मॉडल की सबसे बड़ी भूल क्या रही है?
प्रश्न 4- जैव विविधता के ह्रास होने से मुख्य रूप से क्या परिणाम सामने आया है?
प्रश्न 5- 'प्रदूषित' शब्द में मूल शब्द और प्रत्यय का सही संयोजन क्या है?
प्रश्न 6- 'दुर्लभ' शब्द का विलोम शब्द निम्नलिखित में से कौन सा है?
प्रश्न 7- 'सतत विकास' (Sustainable Development) से क्या तात्पर्य है?
प्रश्न 8- गद्यांश का शीर्षक निर्धारण करने के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प कौन सा होगा?
अपठित पद्यांश 2 (समय और कर्तव्य निष्ठा पर आधारित)
बीत गया जो समय, कभी वह लौटकर वापस आता है क्या?
कल के कलैंडر का पन्ना, जीवन में फिर से गाता है क्या?
अवसर की धारा बहती है, जो इसको थाम नहीं पाते,
जीवन भर पछताने के सिवा, उनके हिस्से कुछ आता है क्या?
समय किसी का मीत नहीं है, यह तो अपनी चाल चलेगा,
बहा ले जाएगा महलों को, या झोपड़ियों को ढालेगा।
जो इस महाकाल की गति को पहचान समय से चल पाता,
काल चक्र के पहियों नीचे वह कभी न पिसता-मलता है क्या?
उठो, सँभलो और पहचानो इस जीवन के हर एक क्षण को,
पल-पल की इस मणिका से सींचो अपने श्रम के कण को।
कल किसने देखा है मित्रों, आज ही सब कुछ करना होगा,
कर्तव्य पथ पर चलकर तुमको इतिहास नया गढ़ना होगा।
पद्यांश 2 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- पद्यांश के आरंभ में कवि ने किस सार्वभौमिक सत्य को रेखांकित किया है?
प्रश्न 2- अवसर की धारा को न थाम पाने वाले लोगों की क्या दशा होती है?
प्रश्न 3- 'समय किसी का मीत नहीं है' इस कथन का क्या आशय है?
प्रश्न 4- काल चक्र के पहियों के नीचे न पिसने के लिए क्या उपाय बताया गया है?
प्रश्न 5- पद्यांश में प्रयुक्त 'मीत' शब्द का तत्सम या मानक रूप क्या है?
प्रश्न 6- पद्यांश में प्रयुक्त 'क्षण' शब्द का बहुवचन रूप क्या होगा?
प्रश्न 7- कवि का अंतिम संदेश पाठकों के लिए क्या है?
अपठित गद्यांश 3 (शिक्षा और मानवीय मूल्यों के समन्वय पर आधारित)
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है, किंतु शिक्षा का वास्तविक स्वरूप केवल साक्षरता या उपाधियाँ प्राप्त करना भर नहीं है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में हम शिक्षा को रोजगार प्राप्ति का एक मात्र यंत्र मान बैठे हैं, जिसके फलस्वरूप शिक्षण संस्थानों में नैतिक मूल्यों का ह्रास तेजी से हो रहा है। स्वामी विवेकानंद ने बहुत पहले कहा था कि 'ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।' आज हमारी शिक्षा प्रणाली डिग्रियाँ तो धड़ल्ले से बाँट रही है, परंतु संवेदना, करुणा, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे बुनियादी मानवीय गुणों को पाठ्यक्रम के हाशिए पर धकेल दिया गया है। एक आदर्श शिक्षक का कर्तव्य केवल विद्यार्थियों के मस्तिष्क में तथ्यों को ठूँसना नहीं है, बल्कि उनके भीतर छिपी हुई जिज्ञासा और आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) को जागृत करना है। जब तक शिक्षा के साथ नैतिकता का संपुट नहीं जुड़ेगा, तब तक तकनीकी रूप से उन्नत समाज भी अंदर से खोखला ही रहेगा। इसलिए यह अनिवार्य हो गया है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली का पुनरुत्थान करें और उसमें मूल्य-आधारित शिक्षा (Value-based Education) को सर्वोच्च प्राथमिकता दें ताकि भावी पीढ़ी राष्ट्र निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभा सके।
गद्यांश 3 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- गद्यांश के अनुसार शिक्षा का वास्तविक स्वरूप क्या नहीं है?
प्रश्न 2- स्वामी विवेकानंद के अनुसार आदर्श शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए?
प्रश्न 3- वर्तमान शिक्षा प्रणाली में किस बात की सबसे बड़ी कमी देखी जा रही है?
प्रश्न 4- एक आदर्श शिक्षक का मुख्य कर्तव्य गद्यांश के अनुसार क्या होना चाहिए?
प्रश्न 5- 'प्रतिस्पर्धी' शब्द में मूल शब्द क्या है?
प्रश्न 6- 'सहिष्णुता' शब्द का सही विलोम शब्द क्या होगा?
प्रश्न 7- गद्यांश में प्रयुक्त 'संपुट' शब्द का निकटतम अर्थ क्या है?
प्रश्न 8- गद्यांश का मुख्य संदेश क्या है?
अपठित पद्यांश 3 (राष्ट्रभक्ति और बलिदान की भावना पर आधारित)
शीश झुके या कटे देश का, ऐसा कभी न होने देंगे,
इस पावन माटी के आँचल को, मलिन कभी न होने देंगे।
जो सपूत इस धरा की खातिर, सूली पर भी चढ़ जाते हैं,
उनके बलिदानों की गाथा, इतिहास कभी न खोने देंगे।
माना कि आज डगर कठिन है, और तिमिर ने घेरा है,
पर निश्चय के सूरज से हम, लाएँगे नया सबेरा है।
लहू पसीना एक करेंगे, इस भारत की हर क्यारी में,
समरसता का दीप जलाकर, भर देंगे हर फुलवारी में।
जो टकराएगा इस भारत की एकता और शान से,
उसका अहंकार मिटा देंगे हम अपनी आन-बान से।
ऐ वतन तेरे चरणों में, सर्वस्व समर्पित अपना है,
तुझे विश्व गुरु के आसन पर देखना हमारा सपना है।
पद्यांश 3 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- कवि ने पद्यांश के आरंभ में देश के संबंध में क्या प्रतिज्ञा व्यक्त की है?
प्रश्न 2- सपूतों के बलिदान के संबंध में कवि का क्या दृष्टिकोण है?
प्रश्न 3- 'तिमिर' शब्द का क्या अर्थ है और कवि ने इसे कैसे दूर करने की बात कही है?
प्रश्न 4- भारत को किस आसन पर देखने का सपना कवि ने देखा है?
प्रश्न 5- पद्यांश में प्रयुक्त 'सपूत' शब्द का विलोम शब्द क्या होगा?
प्रश्न 6- 'माटी' शब्द किस प्रकार का शब्द है?
प्रश्न 7- पद्यांश का मुख्य स्वर (रस) कौन सा है?
अपठित गद्यांश 4 (भाषा, संस्कृति और वैश्वीकरण के प्रभाव पर आधारित)
भाषा केवल संवाद का माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि वह किसी जाति और संस्कृति की संपूर्ण मानसिक संरचना, उसकी अस्मिता और उसके इतिहास की वाहक होती है। जब कोई भाषा संकट में पड़ती है, तो उस संस्कृति का संपूर्ण लोक-आकाश भी धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है। आज वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी और अन्य वैश्विक भाषाओं का प्रभाव इतनी तीव्र गति से बढ़ रहा है कि हमारी अपनी मातृभाषाएँ और क्षेत्रीय बोलियाँ अपने ही घरों में उपेक्षित हो रही हैं। यह विडंबना ही है कि हम आधुनिक बनने की होड़ में अपनी जड़ों को ही काट रहे हैं। भाषा का यह संकट केवल शब्दों का संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का लोप होना है। लोकगीत, लोककथाएँ, मुहावरे और लोकोक्तियाँ जो सदियों के अनुभव से सींची गई हैं, वे आधुनिक शिक्षा की चकाचौंध में दम तोड़ रही हैं। किसी भी राष्ट्र की सृजनात्मक ऊर्जा विदेशी भाषाओं के उधार लिए गए ढाँचों से पुष्पित-पल्लवित नहीं हो सकती; उसके लिए अपनी मातृभाषा की उर्वर भूमि का होना अनिवार्य है। यदि हमें अपनी मौलिकता और सांस्कृतिक विविधता को बचाए रखना है, तो हमें अपनी भाषाओं के प्रति न केवल गर्व का भाव रखना होगा बल्कि उन्हें शिक्षा, विज्ञान और रोजगार की मुख्यधारा में भी पूरी सक्रियता से जोड़ना होगा।
गद्यांश 4 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- गद्यांश के अनुसार भाषा की वास्तविक भूमिका क्या है?
प्रश्न 2- वैश्वीकरण के दौर में मातृभाषाओं के समक्ष क्या संकट उत्पन्न हो गया है?
प्रश्न 3- भाषा का संकट गद्यांश के अनुसार वस्तुतः किसका संकट है?
प्रश्न 4- किसी राष्ट्र की सृजनात्मक ऊर्जा के विकास के लिए क्या अनिवार्य माना गया है?
प्रश्न 5- 'मातृभाषा' शब्द किस प्रकार का समास है?
प्रश्न 6- 'उपेक्षित' शब्द का मूल शब्द और प्रत्यय क्या है?
प्रश्न 7- मातृभाषाओं को पुनर्जीवित करने के लिए गद्यांश में क्या उपाय सुझाया गया है?
प्रश्न 8- गद्यांश का केंद्रीय विषय क्या है?
अपठित पद्यांश 4 (नैतिक मूल्य और मानवीय संवेदना पर आधारित)
पत्थर की मूरतों में हमने भगवान को ढूँढा बहुत,
अपनों की आँखों में छिपे इंसान को ढूँढा बहुत।
मंदिर और मस्जिद की इन लंबी दीवारों के परे,
मजहब के इस बाज़ार में ईमान को ढूँढा बहुत।
फूलों की इस महक में भी अब भेद की खुशबू है क्यों?
हर आँख में सहमा हुआ सा कोई सूखा आँसू है क्यों?
जो बाँटता फिरता था कल तक दिलों को प्रेम की छाँव में,
आज उसी मनुष्य के भीतर नफ़रत का भँवर क्यूँ है?
उठो और बुझा दो इस वैमनस्य की हर एक चिनगारी को,
गले लगा लो फिर से आकर इस धरती के महतारी को।
प्रेम से बढ़कर न कोई ग्रन्थ है न वेद है कोई,
मानवता ही धर्म है अपना, बाकी सब भेद झोई।
पद्यांश 4 के वैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न 1- कवि ने किन दो स्थानों पर भगवान और इंसान को ढूँढने की बात कही है?
प्रश्न 2- 'मजहब के इस बाज़ार में ईमान को ढूँढा बहुत' इस पंक्ति का क्या व्यंग्य है?
प्रश्न 3- मनुष्य के भीतर आज किस चीज़ का भँवर उत्पन्न हो गया है?
प्रश्न 4- कवि के अनुसार सबसे बड़ा ग्रंथ या वेद कौन सा है?
प्रश्न 5- पद्यांश में प्रयुक्त 'वैमनस्य' शब्द का विलोम शब्द क्या है?
प्रश्न 6- 'मूरतों' शब्द का एकवचन रूप निम्नलिखित में से क्या है?
प्रश्न 7- संपूर्ण पद्यांश का केंद्रीय संदेश क्या है?
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लेख / जानकारी का विषय क्षेत्र : शिक्षा एवं परीक्षा तैयारी (हिन्दी भाषा और साहित्य)
लेख / जानकारी का स्रोत : माध्यमिक शिक्षक चयन परीक्षा पाठ्यक्रम एवं भाषायी मानक अध्ययन पद्धति
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